2019 महासंग्राम: कांग्रेस-‘आप’ गठबंधन की राह में 5 बड़े अड़ंगे

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मिशन 2019 को सफल बनाने की कवायद में हरेक पार्टी जी-जान से जुड़ी हुई है। इसी कड़ी में हरेक छोटी-बड़ी पार्टी गठबंधन की राह पर चल कर चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत बनाना चाहती है परंतु लोकसभा चुनावों में कांग्रेस व ‘आप’ के मध्य गठबंधन को लेकर लगातार बनी तनातनी के चलते पिछले 2 महीनों में दोनों पार्टियों के मध्य 6 मार्च को हुई बैठक में गठबंधन को अमलीजामा पहनाए जाने का तीसरा प्रयास भी फ्लाप हो गया।
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लगातार हुई कोशिशों के बावजूद गठबंधन सिरे न चढऩे के विभिन्न कारण बताए जा रहे हैं। कांग्रेस और ‘आप’ दोनों पार्टियों में कुछ ऐसे गुट थे जोकि गठबंधन के पक्षधर नहीं थे। दोनों पार्टियों के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा अपनी-अपनी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व को इस बारे में अवगत भी कराया गया था। उसके बाद भी बातचीत का सिलसिला तो जारी रहा मगर कभी दिल्ली-पंजाब में सीट बंटवारा तो कभी प्रदेश इकाई के विरोध के चलते गठबंधन से दोनों दलों को पीछे हटना पड़ा। हालांकि, पार्टी की ओर से इसकी आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की गई परंतु गठबंधन को लेकर 5 ऐसे मुख्य अड़ंगे हैं जिनकी वजह से दोनों दलों में गठबंधन पर सहमति नहीं बन पाई।

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शीला दीक्षित सहित दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेताओं का एतराज 

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की प्रधान शीला दीक्षित व प्रदेश इकाई के कई ऐसे नेता ‘आप’ के साथ गठबंधन पर विरोध जता रहे हैं। उक्त नेताओं ने राहुल गांधी सहित आलाकमान पर दबाव की रणनीति बनाए रखी जिसके चलते तीसरी बैठक में दोनों दलों में गठबंधन पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई। दिल्ली कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि अगर ‘आप’ के साथ समझौता हुआ तो कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक कांग्रेस से विमुख हो जाएगा।

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कै. अमरेन्द्र का विरोध और पंजाब में सीट बंटवारे पर विवाद
‘आप’ के साथ गठबंधन को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह भी नकार चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ पंजाब में सीट बंटवारे पर उठा विवाद भी एक बड़ा कारण साबित हुआ। दिल्ली के तीन-तीन-एक के फार्मूले की तर्ज पर ‘आप’ पंजाब में भी छह-छह-एक के फार्मूले पर सीटों का बंटवारा चाहती है परंतु पंजाब में कांग्रेस की स्थिति मजबूत होने के कारण मुख्यमंत्री सहित वरिष्ठ नेता किसी पार्टी से गठबंधन करने की बजाय अकेले चुनाव लडऩे के पक्ष में हैं, इसलिए गठबंधन को लेकर दोनों दलों में सहमति नहीं बन पा रही है।

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राजीव गांधी से भारत रत्न वापस लेने का प्रस्ताव भी बना एक कारण
दिल्ली विधानसभा में 2 महीने पहले 84 के सिख विरोधी दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग वाला एक प्रस्ताव आया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मरणोपरांत मिले भारत रत्न को वापस लिए जाने का प्रस्ताव असैम्बली में पास हो गया लेकिन आम आदमी पार्टी ने बाद में असैम्बली के बाहर ऐलान किया कि प्रस्ताव में तकनीकी खामी थी, इसलिए राजीव पर लाया गया संशोधन पारित नहीं हुआ है। इस प्रकरण को ध्यान में रखकर भी कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता गठबंधन पर ‘आप’ को ’यादा भाव देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। उक्त प्रस्ताव भी गठबंधन न हो पाने का एक कारण रहा।

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दिल्ली में सीट बंटवारे पर भी नहीं बनी सहमति
लोकसभा चुनावों में दिल्ली में भी सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस व ‘आप’ में सहमति नहीं बन पाई। सीट बंटवारे को लेकर भी दोनों पार्टियों में खासा मतभेद रहा। चूंकि दिल्ली में यमुनापार की 2 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का खासा प्रभाव है और इनमें से एक सीट पर कांग्रेस अपना प्रत्याशी खड़ा करना चाहती है जबकि ‘आप’ पहले से ही दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है जिन्होंने अपना चुनाव प्रचार अभियान भी शुरू कर रखा है।

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सांसद भगवंत मान सहित कई नेता भी गठबंधन विरोधी
आम आदमी पार्टी के अंदर भी एक बड़ा धड़ा ऐसा है जोकि कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर खुश नहीं है। पंजाब से सांसद भगवंत मान सहित इन नेताओं ने कई बार आप संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपनी राय दे चुके हैं कि अगर पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करती है तो जनता में इसका गलत संदेश जाएगा क्योंकि ‘आप’ जब अस्तित्व में आई थी तो उसने सबसे पहले कांग्रेस की नीतियों का जमकर विरोध किया था।

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…अभी खत्म नहीं हुई उम्मीद : गोपाल राय
वहीं दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री गोपाल राय का कहना है कि कांग्रेस की ओर से तीन बार गठबंधन के इंकार के बाद भी अभी उम्मीद खत्म नहीं हुई है। गोपाल राय ने कहा कि गठबंधन होगा अथवा नहीं इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि हम कांग्रेस के साथ गठबंधन सिर्फ देश हित में चाहते हैं, महागठबंधन के दलों का फैसला था कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनावों की जंग में विपक्षी मतों का बंटवारा न हो। जो पार्टी जहां मजबूत है, वह अन्य दलों के साथ मिलकर वहां चुनाव लड़े।  पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के दरवाजे अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं। देश हित में अगर जरूरत हुई और किसी एक फार्मूले पर बात बनी तो यह गठबंधन संभव है। हालांकि उनका कहना था कि जो भी फार्मूला तय होगा, उसे दिल्ली के साथ पंजाब में भी लागू किया जाएगा। सूत्रों का यह भी कहना है कि दिल्ली के साथ पंजाब में सीटों के बंटवारे को लेकर भी दोनों दलों में असहमति है। हालांकि पार्टी नेताओं ने इससे इंकार किया है। पार्टी का कहना है कि अभी तक सीट बंटवारे पर कांग्रेस के साथ बात ही नहीं हुई है।

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