इलेक्शन डायरी: जब बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखना पड़ा भारत का सोना

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नई दिल्ली : पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को देश में आर्थिक सुधारों के जनक के तौर पर याद किया जाता है। उन्हीं के कार्यकाल के दौरान वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का काम किया था लेकिन उन्हीं के कार्यकाल में एक ऐसी चूक भी हुई जिससे दुनिया भर में भारत की छवि खराब हुई।
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यह फैसला भारत के 47 टन सोने को बैंक ऑफ इंगलैंड और बैंक ऑफ जापान के पास गिरवी रखने का था। हालांकि उन्हें यह फैसला अपनी पूर्ववर्ती चंद्र शेखर की सरकार की नाकामियों के कारण लेना पड़ा था। दरअसल उस समय भारत को दुनिया से कच्चा तेल और अन्य खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए डॉलरों की जरूरत थी और भारत के पास इस अदायगी के लिए डॉलर नहीं थे, लिहाजा देश के 47 टन सोने को करीब 405 मिलियन डॉलर के बदले गिरवी रखा गया और इसके बदले मिले पैसे से विदेशी कर्ज उतारा गया।
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यह एक ऐसा दौर था जब सोवियत संघ में विभाजन के चलते भारत का निर्यात सोवियत देशों को रुक गया और हमारे पास डॉलर की कमी हो गई जबकि दूसरी तरफ अरब देशों में चल रहे ईरान संकट से तेल की कमी पैदा हो गई। इस दौरान देश में राजनीतिक अस्थिरता के बीच उत्पादन ठप्प होने से अर्थव्यवस्था पंगु हो गई और हमारे निर्यात के मुकाबले हमारा आयात बढऩे लगा। इससे डॉलर की कमी पैदा हुई और नतीजा देश का सोना गिरवी रखने के रूप में सामने आया।
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नरसिम्हा राव ने जून में ही कुर्सी संभाली थी और जुलाई 1991 में उन्हें यह कड़वा फैसला लेना पड़ा लेकिन इस फैसले के 18 साल बाद भारत ने 2009 में इंटरनैशनल मॉनिटरी फंड से 200 टन सोना खरीद कर इस गलती की भरपाई की और यह सोना आर.बी.आई. के गोल्ड रिजर्व में रखा गया।

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