गुलाबी गेंद शुरुआत में लाल की तुलना में ज्यादा स्विंग करेगी, हाथ से हुई है इसकी सिलाई

0
64

क्रिकेट जगत में इस समय चारों तरफ एक ही चर्चा है और वह है एसजी की गुलाबी गेंद, क्योंकि इसी से भारत अपना पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेलने जा रहा है। हर कोई जानना चाहता है कि गुलाबी गेंद की सीम क्या कमाल दिखाएगी, यह गेंद कैसा बर्ताव करेगी? एसजी कंपनी के मार्केटिंग डायरेक्टर पारस आनंद का कहना है कि यह गेंद लाल और सफेद गेंद का मिला-जुला उत्पाद है, लेकिन यह शुरुआती 20 ओवर में लाल गेंद की अपेक्षा ज्यादा स्विंग करेगी।

लाल और सफेद गेंद से अलग कैसे : पारस ने फोन पर हुई बातचीत में बताया कि जिस तरीके से हम सफेद गेंद पर रंग चढ़ाते हैं, वैसे ही हमने गुलाबी गेंद पर भी रंग चढ़ाया है। इस मामले में यह सफेद गेंद की तुलना में एक समान हो गई। इसके अलावा गुलाबी गेंद बनाने की अन्य प्रक्रियाएं लाल गेंद वाली ही हैं। इसका मूल (कोर) लाल गेंद वाला है, लेकिन रंगने वाली प्रक्रिया सफेद गेंद वाली है। यानी आप कह सकते हैं कि यह एक तरह से दोनों गेंदों के बीच का उत्पाद है।

कैसा होगा बर्ताव : पारस ने कहा कि हमने भी इस गेंद का परीक्षण किया है। काफी मैचों में इसके प्रयोग किए गए हैं। हमारे यहां जो परीक्षण सुविधा है, वहां भी हमने इसको आंका है। इससे पता चलता है कि कम से कम शुरुआती 20 ओवर में यह गेंद लाल गेंद की तुलना में ज्यादा स्विंग करती है। दुनिया में अब तक 11 डे-नाइट टेस्ट हुए हैं और उनमें पिच पर ज्यादा घास छोड़ी गई।

उसके हिसाब से कहा जा रहा है कि यहां पर भी ऐसा ही होगा। ऐसे में अगर पिच पर घास ज्यादा रहेगी तो निश्चित रूप से तेज गेंदबाजों को ज्यादा मदद मिलेगी। मैंने एक फोटो देखी थी जिसमें उमेश यादव और मुहम्मद शमी जैसे भारतीय तेज गेंदबाज इस गेंद को देखकर खुश दिखाई दे रहे थे। वे गेंद की सीम एसजी लाल गेंद की तरह देखकर खुश थे। वे इसलिए खुश हो रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वे इस गेंद से और भी ज्यादा अच्छी गेंदबाजी करेंगे।

दोपहर में मैच शुरू होने से कोई दिक्कत नहीं : जब पारस से पूछा गया कि टेस्ट मैच सुबह शुरू होते हैं और उसमें तेज गेंदबाज नमी और परिस्थितियों का फायदा उठाते हैं, लेकिन डे-नाइट टेस्ट दोपहर एक बजे शुरू होगा। ऐसे में पिच पर नमी नहीं होगी तो उन्होंने कहा कि शुरुआत में नई गेंद ज्यादा सख्त होती है। ऐसे में चाहे दोपहर हो, रात हो, धूप हो या छांव हो, गुलाबी गेंद शुरू में स्विंग करेगी ही करेगी। हालांकि, जैसे-जैसे इसकी बाहरी परत कमजोर पड़ेगी वैसे-वैसे इसकी स्विंग कम होती चली जाएगी। हमें पता है कि लाल गेंद रिवर्स स्विंग होती है। गेंदबाज लाल गेंद की एक तरफ की चमक कम करके रिवर्स स्विंग कराते हैं, लेकिन गुलाबी गेंद से ऐसा होने में थोड़ा समय लग जाता है और यही एक चुनौती है।

सीखने का मौका : पारस ने कहा कि हमारी गेंद डे-नाइट टेस्ट में पहली बार इस्तेमाल हो रही है और भारत में पहली बार डे-नाइट टेस्ट आयोजित हो रहा है। ऐसे में यह सबके लिए एक सीखने का मौका है। मैदान कर्मचारी, विकेट तैयार करने वाले क्यूरेटर, हमारे जैसी गेंद निर्माता कंपनी और यहां तक कि खिलाडि़यों के लिए यह एक नई चीज है। हाल ही में चेतेश्वर पुजारा और रविचंद्रन अश्विन ने कहा है कि यह गेंद थोड़ी अलग है।

विराट कोहली भी कह रहे हैं कि यह गेंद थोड़ी ज्यादा स्विंग करेगी। कुल मिलाकर हम सबके लिए यह एक नई चीज है। हालांकि, अगर यह भारत में सफल हो जाती है और खिलाडि़यों को लगता है कि हम इस गेंद से संतुष्ट हैं तो यह एक रोचक चीज होगी। एक और बात है कि भारत में टेस्ट क्रिकेट में मैदान ज्यादातर खाली रहते हैं, लेकिन डे-नाइट टेस्ट की वजह से काफी दर्शक आ सकते हैं। दफ्तर में काम करने वाले लोग और स्कूली बच्चे आराम से शाम के बाद आकर एक-दो सत्र देख सकते हैं।

जल्द खत्म होते हैं डे-नाइट टेस्ट : जब पारस से पूछा गया कि डे-नाइट टेस्ट के रिजल्ट आते हैं और ये पांच दिन से पहले ही खत्म हो जाते हैं। क्या इसके पीछे गुलाबी गेंद हैं तो उन्होंने कहा कि मैं बस एक ही बात कहना चाहूंगा कि चाहे वह हमारी गेंद हो, कूकाबुरा या ड्यूक की गेंद हो, सभी एक ही तरह से बनी हैं। गेंद की चमक बनाए रहने के लिए जो अतिरिक्त रंग चढ़ाए जाते हैं, उसकी वजह से गेंद ज्यादा स्विंग होती है। अभी तक जो भी डे-नाइट टेस्ट हुए हैं उसमें खेलने के लिए बल्लेबाज ज्यादा अभ्यस्त नहीं हैं।

अभी बल्लेबाज सपाट विकेट पर लंबे-लंबे शॉट्स मारने के लिए ज्यादा अभ्यस्त हैं। यानी मुकाबला बल्लेबाजों के हक में ज्यादा चला गया है, लेकिन अब गुलाबी गेंद गेंदबाजों के पक्ष में मुकाबला वापस ला रही है। जब शाम होने के बाद तुरंत फ्लड लाइट जलने का समय होगा, तब बल्लेबाजों के लिए मुश्किल होगी। मैच दोपहर एक बजे शुरू होगा और पांच-छह बजे फ्लड लाइट जलना शुरू हो जाएंगी। यह ऐसा समय होगा जब गेंद की चमक कमजोर पड़ जाएगी, जिससे गेंदबाजों को थोड़ी कम मदद मिल सकती है। ऐसे में यह मुकाबले को संतुलित करने का भी काम करेगा, क्योंकि 50-60 ओवर के बाद गेंद की सख्ती भी कम होती है।

विकेट पर सबकुछ निर्भर : एसजी की लाल गेंद की चमक जल्द कमजोर पडने लगती है। उस लाल गेंद से गुलाबी गेंद के फर्क पर उन्होंने कहा कि देखिए अगर विकेट बहुत सख्त और सूखी है तो वह गेंद को महज 10 ओवर में भी पुराना कर देगी। इंदौर में पिच पर ज्यादा घास छोड़ी गई थी। अगर वैसी विकेट मिले तो 25 ओवर में भी गेंद की सीम साफ नजर आएगी। तब उस मैच में गेंद की चमक को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि गेंद 25 ओवर पुरानी है। ऐसे में इस गेंद के साथ विकेट का ज्यादा फैक्टर रहता है।

सीम का होगा असर : कूकाबुरा की गुलाबी गेंद की सिलाई मशीन से होती है और एसजी की गुलाबी गेंद की सिलाई हाथ से होती है। इससे सीम पर आने वाले फर्क पर पारस ने कहा कि मशीन से सिली हुई गेंद की सीम दब जाती है। ऐसे में गेंदबाज सीम से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। वहीं, हाथ से सिली हुई गेंद की सीम ज्यादा देर तक रहती है और गेंदबाज गेंद को स्विंग कराने के लिए इसका इस्तेमाल 40-50 ओवर के बाद भी कर सकता है। उन्होंने कहा कि यह गेंद फोर पीस में होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here