जब जेपी आंदोलन से डर गई थीं इंदिरा गांधी, इसके बाद लगा दिया था आपातकाल

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इंदिरा गांधी के शासन के दौरान देश मंहगाई से लेकर कई बुनियादी जरूरतों की पूर्ति नहीं होने वाली कठिनाइयों से जूझ रहा था और जनता इंदिरा गांधी की सरकार से परेशान से हो गई थी। उस वक्त जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया और उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखा और देश के बिगड़ते हालात के बारे में बताया। उसके बाद देश के अन्य सासंदों को भी पत्र लिखा और इंदिरा गांधी के कई फैसलों को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।

कोष को भरने के लिए इंदिरा गांधी ने की थी चंदे की मांग
जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थी, इंदिरा गांधी ने उनसे चंदे की मांग की। इस दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चीमन भाई से भी 10 लाख रुपये की मांग की गई थी, जिससे कोष को बढ़ाने के लिए कई चीजों के दाम बढ़ा दिए गए। जिसके बाद राज्य में आंदोलन शुरू हो गए और पुलिस ने आंदोलनकारियों की बर्बरता पूर्वक पिटाई की, जिसमें आंदोलनकारियों की जान चली गई। इस दौरान 24 जनवरी 1974 मुख्यमंत्री के इस्तीफे की तारीख तय कर दी गई। लेकिन चीमन भाई के रवैये से आंदोलन और भड़क गया। उसके बाद जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का समर्थन किया, जिसके बाद उन्हें गुजरात बुलाया गया।  

गुजरात से बिहार तक फैल गया था आंदोलन
जयप्रकाश नारायण के गुजरात जाने से पहले इंदिरा गांधी ने राज्यपाल के जरिए अपने हाथ में सत्ता रखने की कोशिश की और 9 फरवरी 1974 को जयप्रकाश नारायण के गुजरात आने से दो दिन पहले ही चिमनभाई से इस्तीफा दिलवा दिया और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। उसके बाद मोरारजी देसाई ने जयप्रकाश नारायण के साथ मिलकर दोबारा चुनाव करवाने की मांग की। इसके साथ ही यह आंदोलन बिहार जैसे अन्य राज्यों में भी फैलने लगा। उसके बाद रेलवे के लाखों कर्मचारी हड़ताल पर चले गए, जिससे इंदिरा गांधी के सामने दिक्कत खड़ी होने लगी। 

सत्ता के खिलाफ भड़क उठे लोग
8 अप्रैल 1974 को जयप्रकाश नारायण ने सरकार के विरोध में एक जुलूस निकाला, जिसमें सत्ता के खिलाफ लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। जयप्रकाश नारायण के इस आंदोलन से इंदिरा गांधी के पैरों तले से सत्ता की जमीन खिसकने लगी और इंदिरा गांधी को इतना विरोध का सामना करना पड़ा कि उनकी कुर्सी हिल गई। 

जेपी ने किया उत्तर भारत का दौरा 
जयप्रकाश नारायण ने उत्तर भारत के कई हिस्सों का दौरा किया, छात्रों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों को आंदोलन में शामिल होने के लिए तैयार किया। 1971 में जिन विपक्षी दलों को कुचल दिया गया, उन्होंने जेपी को एक लोकप्रिय नेता के तौर पर देखा, जो इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़े होने के लिए सबसे उपयुक्त थे। जेपी ने भी इन दलों की संगठनात्मक क्षमता की आवश्यकता को महसूस किया, ताकि वे गांधी का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें।

राजनारायण प्रकरण ने निभाई अहम भूमिका 
राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक केस दाखिल किया था, जिस पर जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया था। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दे दी। परंतु, उसके एक दिन बाद जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वान किया। जिससे देश भर में हड़तालें शुरू हो गईं और जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत कई नेताओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था। विपक्ष लगातार सरकार पर दबाव बना रहा था। जिसका नतीजा यह हुआ कि इंदिरा गांधी ने 25 जून की रात में देश में आपातकाल लागू करने का फैसला लिया। 

आजाद भारत के इतिहास का सबसे विवास्पद दौर
आजाद भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद दौर था। इस समय में चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। 26 जून को समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में आपातकाल की घोषणा के बारे में सुना।

1977 में कांग्रेस को करना पड़ा पराजय का सामना
जय प्रकाश नारायण की लड़ाई निर्णायक मुकाम तक पहुंची। इंदिरा गांधी को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। मोरारजी देसाई की अगुवाई में जनता पार्टी का गठन हुआ। 1977 में फिर लोकसभा के चुनाव कराये गए, जिसमें कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा। 

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