विरोधियों का गणित बिगाड़ सकता है नैकां-कांग्रेस गठबंधन

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आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर जम्मू-कश्मीर में नैशनल कांफ्रैंस एवं कांग्रेस के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन की कवायद जोर-शोर से शुरू हो गई है। इस संबंध में दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बीच राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में बैठकों का दौर चल रहा है, बस मामला सीट आवंटन पर अटका है। राज्य के राजनीतिक समीकरण इशारा करते हैं कि यदि नैशनल कांफ्रैंस एवं कांग्रेस का यह गठबंधन हो जाता है तो विरोधी दलों भारतीय जनता पार्टी, पी.डी.पी. और पीपल्स कांफ्रैंस के उम्मीदवारों के लिए खतरा साबित हो सकता है।

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नैशनल कांफ्रैंस और कांग्रेस के संबंधों का इतिहास बेहद पुराना है या यूं कहें तो वर्ष 1947 में मिली आजादी से भी कई वर्ष पुराना है। पंडित जवाहर लाल नेहरू और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के संबंधों से शुरू हुए इस सिलसिले के दौरान दोनों पार्टियों के संबंधों में कई बार भारी खटास और मधुरता के पल आए। पिछले एक दशक की बात करें तो 2009 में दोनों पार्टियों ने मिलकर उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनाई और निरंतर मतभेदों के बावजूद 6 वर्ष तक सरकार चलाई।

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अब 2019 की चुनावी महाभारत को अपने अनुकूल करने के लिए राज्यसभा में विपक्ष के नेता एवं जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस प्रबंधन समिति के अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद की पहल पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एवं नैशनल कांफ्रैंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने बैठक कर गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा की है। हालांकि, पार्टी के कुछ नेता संभावित गठबंधन के स्पष्ट संकेत दे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गुलाम अहमद मीर और नैशनल कांफ्रैंस के जम्मू संभाग अध्यक्ष देवेंद्र सिंह राणा का कहना है कि गठबंधन का निर्णय दोनों पार्टियों के नेतृत्व को ही करना है और फिलहाल कोई निर्णय नहीं हुआ है।

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सूत्रों के अनुसार गठबंधन का यह पेंच सीटों के बंटवारे पर अटका है, क्योंकि नैशनल कांफ्रैंस पहले ही श्रीनगर-बडग़ाम सीट पर डा. फारूक अब्दुल्ला और जम्मू-पुंछ सीट पर पूर्व मुख्य सचिव बी.आर. कुंडल को प्रत्याशी घोषित कर चुकी है, जबकि कांग्रेस चाहती है कि नैशनल कांफ्रैंस श्रीनगर-बडग़ाम के अलावा बारामूला-कुपवाड़ा सीट पर ही उम्मीदवार उतारे और जम्मू-पुंछ, कठुआ-ऊधमपुर-डोडा, अनंतनाग-पुलवामा व लद्दाख संसदीय क्षेत्र में उसके उम्मीदवार मैदान में उतरें। हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस को अनंतनाग-पुलवामा, कठुआ-ऊधमपुर-डोडा और लद्दाख सीटें मिल सकती हैं, जबकि श्रीनगर-बडग़ाम, बारामूला-कुपवाड़ा व जम्मू-पुंछ सीटों पर नैशनल कांफ्रैंस अपने उम्मीदवार उतार सकती है।
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वर्ष 2014 से पूरी तरह बदले हैं समीकरण
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नैशनल कांफ्रैंस एवं कांग्रेस दोनों पार्टियों को मुंह की खानी पड़ी और राज्य की 6 सीटों में से 3 सीटों जम्मू-पुंछ, कठुआ-ऊधमपुर-डोडा व लद्दाख पर भाजपा एवं 3 सीटों श्रीनगर-बडग़ाम, अनंतनाग-पुलवामा व बारामूला-कुपवाड़ा पर पी.डी.पी. का कब्जा हो गया, लेकिन आज के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह भिन्न हैं।
2014 में जहां जम्मू एवं लद्दाख संभागों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम की लहर थी, वहीं कश्मीर घाटी के लोग स्व. मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त कर रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे लोगों का रुझान बदलने लगा। बाद में मुफ्ती के निधन के बाद जब महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बनी तो उन्हें सांसद के तौर पर उन्हें अनंतनाग-पुलवामा सीट छोडऩी पड़ी और पी.डी.पी. नेतृत्व से नाराजगी के चलते श्रीनगर-बडग़ाम के तत्कालीन सांसद तारिक हामिद कर्रा ने इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थाम लिया तो दो सीटें खाली हो गईं। इन सीटों पर विजय हासिल करने की रणनीति के तहत नैशनल कांफ्रैंस एवं कांग्रेस ने चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया। इसके चलते श्रीनगर-बडग़ाम संसदीय क्षेत्र के चुनावी दंगल में उतरे पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं नैशनल कांफ्रैंस अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला तो संसद पहुंचने में कामयाब हो गए, लेकिन जब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गुलाम अहमद मीर के किस्मत आजमाने की बारी आई तो तत्कालीन महबूबा सरकार की सिफारिश पर निर्वाचन आयोग ने सुरक्षा कारणों से अनंतनाग-पुलवामा संसदीय सीट पर लोकसभा उपचुनाव को स्थगित कर दिया।

पी.डी.पी.-भाजपा सरकार के पतन के साथ ही नेताओं की भगदड़ मचने के कारण पी.डी.पी. कमजोर होती चली गई, जबकि पी.डी.पी. नेताओं के शामिल होने के कारण पीपल्स कांफ्रैंस मजबूत होती चली गई। जहां तक भाजपा का सवाल है तो लद्दाख में अपने सांसद द्वारा इस्तीफा दिए जाने से पार्टी को तगड़ा झटका लगा है, जबकि जम्मू-पुंछ एवं कठुआ-ऊधमपुर-डोडा क्षेत्रों में पार्टी मजबूत स्थिति में है। इन क्षेत्रों में भाजपा को टक्कर देने के कारण कांग्रेस-नैशनल कांफ्रैंस को गठबंधन करने की नितांत आवश्यकता है।

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