भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी का 91 वर्ष की उम्र में निधन

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देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी का निधन हो गया है। वह 91 साल के थे। कई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 91 वर्षीय सोली सोराबजी कोरोना वायरस से संक्रमित थे। कई दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी। सोली सोराबजी का शुक्रवार (30 अप्रैल) को 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक वह कोरोना वायरस से संक्रमित थे और दिल्ली के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। हालांकि परिवार वालों ने अभी कोई अधिकारिक बयान नहीं दिया है। ना ही इस बात की पुष्टी हो पाई है कि वो कोविड-19 पॉजिटिव थे या नहीं?

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया दुख

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के निधन पर दुख जताया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा है,”सोली सोराबजी का जाना, भारत की कानूनी प्रणाली के लिए एक झटका है। वह उन चुनिंदा लोगों में थे जिन्होंने संवैधानिक कानून और न्याय प्रणाली के विकास को गहराई से प्रभावित किया। पद्म विभूषण से सम्मानित, वह सबसे प्रख्यात न्यायविदों में से एक थे। उनके परिवार और सहयोगियों के प्रति मेरी संवेदनाएं हैं।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के निधन पर दुख जताया है। पीएम मोदी ने कहा, सोली सोराबजी एक महाना वकील और बुद्धिजीवी थे। कानून के माध्यम से, वह गरीबों और दलितों की मदद करने में सबसे आगे रहते थे। उन्हें उल्लेखनीय कार्यों को याद किया जाएगा। उनके निधन से दुखी हूं। उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति संवेदनाएं।

जानिए सोली सोराबजी के बारे में?

सोली सोराबजी ने 1953 में बॉम्बे हाई कोर्ट में अपनी कानूनी प्रैक्टिस शुरू की थी। 1971 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का वरिष्ठ वकील नियुक्त किया गया था। वह 1989 से 90 तक भारत के अटॉर्नी जनरल बने। उसके बाद 1998 से 2004 तक अटॉर्नी जनरल रहे थे। सोली सोराबजी को 1997 में नाइजीरिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपरोर्टरी भी नियुक्त किया गया था।

सोली सोराबजी 1998 से 2004 तक मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र उप आयोग के सदस्य और बाद में अध्यक्ष बने थे। सोली सोराबजी को मार्च 2002 में भारत में दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान – पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सोली सोराबजी भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई ऐतिहासिक मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बचाव किया है।

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